Friday, June 30, 2017

549. धरा बनी अलाव (गर्मी के 10 हाइकु)

धरा बनी अलाव  
(गर्मी के 10 हाइकु)  

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1.  
दोषी है कौन?  
धरा बनी अलाव,  
हमारा कर्म!  

2.  
आग उगल  
रवि गर्व से बोला -  
सब झुलसो!  

3.  
रोते थे वृक्ष -  
'मत काटो हमको',  
अब भुगतो!  

4.  
ये पेड़ हरे  
साँसों के रखवाले  
मत काटो रे!  

5.  
बदली सोचे -  
आँखों में आँसू नहीं  
बरसूँ कैसे?  

6.  
बिन आँसू के  
आसमान है रोया,  
मेघ खो गए!  

7.  
आग फेंकता  
उजाले का देवता  
रथ पे चला!  

8.  
अब तो चेतो  
प्रकृति को बचा लो,  
नहीं तो मिटो!  

9.  
कंठ सूखता  
नदी-पोखर सूखे  
क्या करे जीव?  

10.  
पेड़ व पक्षी  
प्यास से तड़पते  
लिपट रोते!  

- जेन्नी शबनम (29. 6. 2017)

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Sunday, June 25, 2017

548. फ़ौजी-किसान (19 हाइकु)

फ़ौजी-किसान  
(19 हाइकु)  

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1.  
कर्म पे डटा  
कभी नहीं थकता  
फ़ौजी-किसान!  

2.  
किसान हारे  
ख़ुदकुशी करते,  
बेबस सारे!  

3.  
सत्ता बेशर्म  
राजनीति करती,  
मरे किसान!  

4.  
बिकता मोल  
पसीना अनमोल,  
भूखा किसान!  

5.  
कोई न सुने  
किससे कहे हाल  
डरे किसान!  

6.  
भूखा-लाचार  
उपजाता अनाज  
न्यारा किसान!  

7.  
माटी का पूत  
माटी को सोना बना  
माटी में मिला!  

8.  
क़र्ज़ में डूबा  
पेट भरे सबका,  
भूखा अकड़ा!  

9.  
कर्म ही धर्म  
किसान कर्मयोगी,  
जीए या मरे!  

10.  
अन्न उगाता  
सर्वहारा किसान  
बेपरवाह!  

11.  
निगल गई  
राजनीति राक्षसी  
किसान मृत!  

12.  
अन्न का दाता  
किसान विष खाता  
हो के लाचार!  

13.  
देव अन्न का  
मोहताज अन्न का  
कैसा है न्याय?  

14.  
बग़ैर स्वार्थ  
करते परमार्थ  
किसान योगी!  

15.  
उम्मीद टूटी  
किसानों की ज़िन्दगी  
जग से रूठी!  

16.  
हठी किसान  
हार न माने, भले  
साँसें निढाल!  

17.  
रंगे धरती  
किसान रंगरेज,  
ख़ुद बेरंग!  

18.  
माटी में सना  
माटी का रखवाला  
माटी में मिला!  

19.  
हाल बेहाल  
प्रकृति बलवान  
रोता किसान!  

- जेन्नी शबनम (20. 6. 2017)

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Thursday, June 1, 2017

547. मर गई गुड़िया...

मर गई गुड़िया...  

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गुड़ियों के साथ खेलती थी गुड़िया  
ता-ता थइया नाचती थी गुड़िया  
ता ले ग म, ता ले ग म गाती थी गुड़िया  
क ख ग घ पढ़ती थी गुड़िया  
तितली-सी उड़ती थी गुड़िया !  

ना-ना ये नही है मेरी गुड़िया  
इसके तो पंख है नुचे  
कोमल चेहरे पर ज़ख़्म भरे  
सारे बदन से रक्त यूँ है रिसता  
ज्यों छेनी हथौड़ी से कोई पत्थर है कटा!  

गुड़िया के हाथों में अब भी है गुड़िया  
जाने कितनी चीख़ी होगी गुड़िया  
हर प्रहार पर माँ-माँ पुकारी होगी गुड़िया  
तड़प-तड़प कर मर गई गुड़िया  
कहाँ जानती होगी स्त्री का मतलब गुड़िया!  

जिन दानवों ने गुड़िया को नोच खाया  
पौरुष दंभ से सरेआम हुंकार रहा  
दूसरी गुड़िया को तलाश रहा  
अख़बार के एक कोने में ख़बर छपी  
एक और गुड़िया हवस के नाम चढी!  

मूक लाचार बनी न्याय व्यवस्था  
सबूत गवाह सब अकेली थी गुड़िया  
जाने किस ईश का शाप मिला  
कैसे किसी ईश का मन न पसीजा  
छलनी हुआ माँ बाप का सीना!  

जाने कहाँ उड़ गई है मेरी गुड़िया  
वापस अब नही आएगी गुड़िया  
ना-ना अब नही चाहिए कोई गुड़िया  
जग हँसाई को हम कैसे सहे गुड़िया  
हम भी तुम्हारे पास आ रहे मेरी गुड़िया!

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2017)  

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