Thursday, November 16, 2017

563. यकीन...

यकीन...

*******  

हाँ मुझे यक़ीन है  
एक दिन बंद दरवाज़ों से निकलेगी ज़िन्दगी  
सुबह की किरणों का आवाभगत करेगी  
रात की चाँदनी में नहाएगी  
कोई धुन गुनगुनाएगी  
सारे अल्फाजों को घर में बंद करके  
सपनों की अनुभूतियों से लिपटी  
मुस्कुराती हुई ज़िन्दगी  
बेपरवाह घुमेगी  
ज़िन्दगी फिर से जीयेगी  
हाँ मुझे यक़ीन है  
ज़िन्दगी फिर से जीयेगी।  

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2017)  

________________________________

Tuesday, November 14, 2017

562. फ्लाईओवर...

फ्लाईओवर...  

*******  

एक उम्र नहीं  
एक रिश्ता नहीं  
कई किश्तों में  
कई हिस्सों में  
बीत जाता है जीवन  
किसी फ़्लाइओवर के नीचे  
प्लास्टिक के कनात के अंदर  
एक सम्पूर्ण एहसास के साथ। 
गुलाब का गुच्छा
सस्ती किताब
सस्ते खिलौने  
जिनपर उनका हक होना था  
बेच रहे पेट की खातिर,  
काग़ज़ और कपड़े के तिरंगे झंडे  
आज बेचते कल कूड़े से उठाते  
मस्त मौला  
तरह-तरह के करतब दिखाते  
और भी जाने क्या-क्या है  
जीवन गुजारने का उनका जरिया।  
आज यहाँ कल वहाँ  
पूरी गृहस्थी चलती है  
इस यायावरी में फूल भी खिलते हैं  
वृक्ष वृद्ध भी होते हैं  
जाने कैसे प्रेम पनपते हैं,  
वहीं खाना वहीं थूकना  
बदबू से मतली नहीं  
ग़ज़ब के जीवट  
गज़ब का ठहराव,  
जो है उतने में हँसते  
कोई सोग (शोक) नहीं  
कोई बैर नहीं  
जो जीवन उससे संतुष्ट  
और ज्यादा की चाह नहीं,  
आखिर क्यों?  
न अधिकार चाहिए  
न सुधार चाहिए।   
बस यूँ ही  
पुश्त दर पुश्त  
खंभे की ओट में  
कूड़े के ढेर के पास  
फ़्लाइओवर के नीचे  
देश का भविष्य  
तय करता है  
जीवन का सफ़र।  

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2017)  

______________________________________

Tuesday, October 24, 2017

561. दीयों की पाँत (दिवाली के 10 हाइकु)

दीयों की पाँत (दिवाली के 10 हाइकु)  

*******  

1.  
तम हरता  
उजियारा फैलाता  
मन का दीया!  

2.  
जागृत हुई  
रोशनी में नहाई  
दिवाली-रात!  

3.  
साँसें बेचैन,  
पटाखों को भगाओ  
दीप जलाओ!  

4.  
पशु व पक्षी  
थर-थर काँपते,  
पटाखे यम!  

5.  
फिर से आई  
ख़ुशियों की दिवाली  
हर्षित मन!  

6.  
दिवाली रात  
दीयों से डर कर  
जा छुपा चाँद!  

7.  
अँधेरी रात  
कर रही विलाप,  
दीयों की ताप!  

8.  
सूना है घर,  
बैरन ये दिवाली  
मुँह चिढ़ाती!  

9.  
चाँद जा छुपा  
सूरज जो गुस्साया  
दिवाली रात!  

10.  
झुमती रात  
तारों की बरसात  
दीयों की पाँत!  

- जेन्नी शबनम (19. 10. 2017)  

__________________________

Saturday, October 7, 2017

560. महाशाप...

महाशाप...  

*******  

किसी ऋषि ने  
जाने किस युग में  
किस रोष में  
दे दिया होगा
सूरज को महाशाप
नियमित, अनवरत, बेशर्त  
जलते रहने का  
दूसरों को उजाला देने का,  
बेचारा सूरज  
अवश्य होत होगा निढाल  
थक कर बैठने का  
करता होगा प्रयास  
बिना जले  
बस कुछ पल  
बहुत चाहता होगा उसका मन,  
पर शापमुक्त होने का उपाय  
ऋषि से बताया न होगा,  
युग सदी बीते, बदले  
पर वह  
फ़र्ज़ से नही भटका  
 कभी अटका  
हमें जीवन और  
ज्योति दे रहा है  
अपना शाप जी रहा है।  
कभी-कभी किसी का शाप  
दूसरों का जीवन होता है।  

- जेन्नी शबनम (7. 10. 2017)  

_________________________

Sunday, September 17, 2017

559. कैसी ज़िन्दगी? (10 ताँका)

कैसी ज़िन्दगी?  
(10 ताँका)  

*******  

1.  
हाल बेहाल  
मन में है मलाल  
कैसी ज़िन्दगी?  
जहाँ धूप न छाँव  
न तो अपना गाँव!  

2.  
ज़िन्दगी होती  
हरसिंगार फूल,  
रात खिलती  
सुबह झर जाती,  
ज़िन्दगी फूल होती!  

3.  
बोझिल मन  
भीड़ भरा जंगल  
ज़िन्दगी गुम,  
है छटपटाहट  
सर्वत्र कोलाहल!

4.  
दीवार गूँगी  
सारा भेद जानती,  
कैसे सुनाती?  
ज़िन्दगी है तमाशा  
दीवार जाने भाषा!

5.  
कैसी पहेली?  
ज़िन्दगी बीत रही  
बिना सहेली,  
कभी-कभी डरती  
ख़ामोशियाँ डरातीं !  

6.  
चलती रही  
उबड-खाबड़ में  
हठी ज़िन्दगी,  
ख़ुद में ही उलझी  
निराली ये ज़िन्दगी!  

7.  
फुफकारती  
नाग बन डराती  
बाधाएँ सभी,  
मगर रूकी नहीं,  
डरी नहीं, ज़िन्दगी!  

8.  
थम भी जाओ,  
ज़िन्दगी झुँझलाती  
और कितना?  
कोई मंज़िल नहीं  
फिर सफ़र कैसा?  

9.  
कैसा ये फ़र्ज़   
निभाती है ज़िन्दगी  
साँसों का क़र्ज़,  
गुस्साती है ज़िन्दगी  
जाने कैसा है मर्ज़!  

10.  
चीख़ती रही  
बिलबिलाती रही  
ज़िन्दगी ख़त्म,  
लहू बिखरा पड़ा  
बलि पे जश्न मना!  

- जेन्नी शबनम (17. 9. 2017)  

_________________________

Friday, September 8, 2017

558. हिसाब-किताब के रिश्ते

हिसाब-किताब के रिश्ते  

*******  

दिल की बातों में ये हिसाब-किताब के रिश्ते  
परखते रहे कसौटी पर बेकाम के रिश्ते!

वक़्त के छलावे में जो ज़िन्दगी ने चाह की  
कतरा-कतरा बिखर गए मखमल-से ये रिश्ते!  

दर्द की दीवारों पे हसीन लम्हे टँके थे  
गुलाब संग काँटों के ये बेमेल-से रिश्ते!  

लड़खड़ा कर गिरते फिर थम-थम के उठते रहे  
जैसे समंदर की लहरें व साहिल के रिश्ते!  

नाम की ख्वाहिश ने जाने ये क्या कराया  
गुमनाम सही पर क्यों बदनाम हुए ये रिश्ते!  

चाँदी के तारों से सिले जज़्बात के रिश्ते  
सुबह की ओस व आसमां के आँसू के रिश्ते!  

किराए के मकां में रह के घर को हैं तरसे  
अपनों की आस में 'शब' ने ही निभाए रिश्ते!  


- जेन्नी शबनम (8. 9. 2017)  

____________________________________

Friday, September 1, 2017

557. सूरज की पार्टी (11 बाल हाइकु)

सूरज की पार्टी  
(11 बाल हाइकु)  

*******

1.  
आम है आया  
सूरज की पार्टी में  
जश्न मनाया!  

2.  
फलों का राजा  
शान से मुस्कुराता  
रंग बिरंगा!  

3.  
चुभती गर्मी  
तरबूज़ का रस  
हरता गर्मी!  

4.  
खीरा-ककड़ी  
लत्तर पे लटके  
गर्मी के दोस्त!  

5.  
आम व लीची  
कौन हैं ज़्यादा मीठे  
करते रार!  

6.  
मुस्कुराता है  
कँटीला अनानास  
बहुत ख़ास!  

7.  
पानी से भरा  
कठोर नारियल  
बुझाता प्यास!  

8.  
पेड़ से गिरा  
जामुन तरो ताज़ा  
गर्मी का दोस्त!  

9.  
मानो हो गेंद  
पीला-सा ख़रबूज़  
लुढ़का जाता!  

10.  
धम्म से कूदा
अँखियाँ मटकाता  
आम का जोड़ा!  

11.  
आम की टोली  
झुरमुट में छुपी  
गप्पें हाँकती!

- जेन्नी शबनम (27. 8. 2017)  

_____________________________

Sunday, August 27, 2017

556. बादल राजा (बरसात पर 10 हाइकु)

बादल राजा 
(बरसात पर 10 हाइकु)  

*******  

1.  
ओ मेघ राजा  
अब तो बरस जा  
भगा दे गर्मी!  

2.  
बदली रानी  
झूम-झूम बरसी  
नाचती गाती!  

3.  
हे वर्षा रानी  
क्यों करे मनमानी  
बरसा पानी!  

4.  
नहीं बरसा  
दहाड़ता गरजा,  
बादल शेर!  

5.  
काला बदरा  
मारा-मारा फिरता  
ठौर न पाता!  

6.  
मेघ गरजा  
रवि भाग के छुपा  
डर जो गया!  

7.  
खिली धरती,  
रिमझिम बरसा  
बदरी काली!  

8.  
ली अँगड़ाई  
सावन घटा छाई  
धरा मुस्काई!  

9.  
बरसा नहीं  
मेघ को ग़ुस्सा आया,  
क्रूर प्रकृति!  

10.  
सुन्दर छवि  
आकाश पे उभरा  
मेघों ने रचा!  

- जेन्नी शबनम (27. 8. 2017)  

__________________________

Tuesday, August 15, 2017

555. कैसी आज़ादी पाई (स्वतंत्रता दिवस पर 4 हाइकु)

कैसी आज़ादी पाई  
(स्वतंत्रता दिवस पर 4 हाइकु)  

*******  

1.  
मन है क़ैदी,  
कैसी आज़ादी पाई?  
नहीं है भायी!  

2.  
मन ग़ुलाम  
सर्वत्र कोहराम,  
देश आज़ाद!  

3.  
मरता बच्चा  
मज़दूर किसान,  
कैसी आज़ादी?  

4.  
हूक उठती,  
अपने ही देश में  
हम ग़ुलाम!  

- जेन्नी शबनम (15. 8. 2017)  

___________________________

Wednesday, August 9, 2017

554. सँवार लूँ...

सँवार लूँ...  

*******  

मन चाहता है  
एक बोरी सपनों के बीज  
मन के मरुस्थल में छिड़क दूँ  
मनचाहे सपने उगा  
ज़िन्दगी सँवार लूँ।  

- जेन्नी शबनम (9. 8. 2017) 

________________________

Monday, August 7, 2017

553. रिश्तों की डोर (राखी पर 10 हाइकु)

रिश्तों की डोर  
(राखी पर 10 हाइकु)  

*******  

1.  
हो गए दूर  
संबंध अनमोल  
बिके जो मोल!  

2.  
रक्षा का वादा  
याद दिलाए राखी  
बहन-भाई!  

3.  
नाता पक्का-सा  
भाई की कलाई में  
सूत कच्चा-सा!  

4.  
पवित्र धागा  
सिखाता है मर्यादा  
जोड़ता नाता!  

5.  
अपनापन  
अब भी है दिखता  
राखी का दिन!  

6.  
रिश्तों की डोर  
खोलती दरवाज़ा  
नेह का नाता!  

7.  
भाई-बहन  
भरोसे का बंधन  
अभिनंदन!  

8.  
खूब खिलती  
चमचमाती राखी  
रक्षाबंधन!  

9.  
त्योहार आया  
भईया परदेशी  
बहना रोती!  

10.  
रक्षक भाई  
बहना है पराई  
राखी बुलाई!  

- जेन्नी शबनम (7. 8. 2017)

___________________________

Monday, July 17, 2017

552. मुल्कों की रीत है...

मुल्कों की रीत है...  

*******

कैसा अजब सियासी खेल है, होती मात न जीत है
नफ़रत का कारोबार करना, हर मुल्कों की रीत है!

मज़हब व भूख़ पर, टिका हुआ सारा दारोमदार है
गैरों की चीख-कराह से, रचता ज़ेहादी गीत है!  

ज़ेहन में हिंसा भरा, मानव बना फौलादी मशीन  
दहशत की ये धुन बजाते, दानव का यह संगीत है!  

संग लड़े जंगे-आज़ादी, भाई-चारा याद नहीं  
एक-दूसरे को मार-मिटाना, बची इतनी प्रीत है!  

हर इंसान में दौड़ता लाल लहू, कैसे करें फर्क  
यहाँ अपना पराया कोई नहीं, 'शब' का सब मीत है!  

-जेन्नी शबनम (17. 7. 2017)  

________________________________________

Friday, July 7, 2017

551. उदासी...

उदासी...  

*******  

ज़बरन प्रेम ज़बरन रिश्ते  
ज़बरन साँसों की आवाजाही  
काश! कोई ज़बरन उदासी भी छीन ले!  

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2017)  

_______________________________

Saturday, July 1, 2017

550. ज़िद (क्षणिका)

ज़िद...  

*******  

एक मासूम सी ज़िद है -  
सूरज तुम छुप जाओ  
चाँद तुम जागते रहना  
मेरे सपनों को आज  
ज़मीं पर है उतरना!  

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2017)

_________________________ 

Friday, June 30, 2017

549. धरा बनी अलाव (गर्मी के 10 हाइकु)

धरा बनी अलाव  
(गर्मी के 10 हाइकु)  

*******  

1.  
दोषी है कौन?  
धरा बनी अलाव,  
हमारा कर्म!  

2.  
आग उगल  
रवि गर्व से बोला -  
सब झुलसो!  

3.  
रोते थे वृक्ष -  
'मत काटो हमको',  
अब भुगतो!  

4.  
ये पेड़ हरे  
साँसों के रखवाले  
मत काटो रे!  

5.  
बदली सोचे -  
आँखों में आँसू नहीं  
बरसूँ कैसे?  

6.  
बिन आँसू के  
आसमान है रोया,  
मेघ खो गए!  

7.  
आग फेंकता  
उजाले का देवता  
रथ पे चला!  

8.  
अब तो चेतो  
प्रकृति को बचा लो,  
नहीं तो मिटो!  

9.  
कंठ सूखता  
नदी-पोखर सूखे  
क्या करे जीव?  

10.  
पेड़ व पक्षी  
प्यास से तड़पते  
लिपट रोते!  

- जेन्नी शबनम (29. 6. 2017)

______________________________ 

Sunday, June 25, 2017

548. फ़ौजी-किसान (19 हाइकु)

फ़ौजी-किसान  
(19 हाइकु)  

*******  

1.  
कर्म पे डटा  
कभी नहीं थकता  
फ़ौजी-किसान!  

2.  
किसान हारे  
ख़ुदकुशी करते,  
बेबस सारे!  

3.  
सत्ता बेशर्म  
राजनीति करती,  
मरे किसान!  

4.  
बिकता मोल  
पसीना अनमोल,  
भूखा किसान!  

5.  
कोई न सुने  
किससे कहे हाल  
डरे किसान!  

6.  
भूखा-लाचार  
उपजाता अनाज  
न्यारा किसान!  

7.  
माटी का पूत  
माटी को सोना बना  
माटी में मिला!  

8.  
क़र्ज़ में डूबा  
पेट भरे सबका,  
भूखा अकड़ा!  

9.  
कर्म ही धर्म  
किसान कर्मयोगी,  
जीए या मरे!  

10.  
अन्न उगाता  
सर्वहारा किसान  
बेपरवाह!  

11.  
निगल गई  
राजनीति राक्षसी  
किसान मृत!  

12.  
अन्न का दाता  
किसान विष खाता  
हो के लाचार!  

13.  
देव अन्न का  
मोहताज अन्न का  
कैसा है न्याय?  

14.  
बग़ैर स्वार्थ  
करते परमार्थ  
किसान योगी!  

15.  
उम्मीद टूटी  
किसानों की ज़िन्दगी  
जग से रूठी!  

16.  
हठी किसान  
हार न माने, भले  
साँसें निढाल!  

17.  
रंगे धरती  
किसान रंगरेज,  
ख़ुद बेरंग!  

18.  
माटी में सना  
माटी का रखवाला  
माटी में मिला!  

19.  
हाल बेहाल  
प्रकृति बलवान  
रोता किसान!  

- जेन्नी शबनम (20. 6. 2017)

_____________________________