Monday, July 17, 2017

552. मुल्कों की रीत है...

मुल्कों की रीत है...  

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कैसा अजब सियासी खेल है, होती मात न जीत है
नफ़रत का कारोबार करना, हर मुल्कों की रीत है!

मज़हब व भूख़ पर, टिका हुआ सारा दारोमदार है
गैरों की चीख-कराह से, रचता ज़ेहादी गीत है!  

ज़ेहन में हिंसा भरा, मानव बना फौलादी मशीन  
दहशत की ये धुन बजाते, दानव का यह संगीत है!  

संग लड़े जंगे-आज़ादी, भाई-चारा याद नहीं  
एक-दूसरे को मार-मिटाना, बची इतनी प्रीत है!  

हर इंसान में दौड़ता लाल लहू, कैसे करें फर्क  
यहाँ अपना पराया कोई नहीं, 'शब' का सब मीत है!  

-जेन्नी शबनम (17. 7. 2017)  

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Friday, July 7, 2017

551. उदासी...

उदासी...  

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ज़बरन प्रेम ज़बरन रिश्ते  
ज़बरन साँसों की आवाजाही  
काश! कोई ज़बरन उदासी भी छीन ले!  

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2017)  

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Saturday, July 1, 2017

550. ज़िद (क्षणिका)

ज़िद...  

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एक मासूम सी ज़िद है -  
सूरज तुम छुप जाओ  
चाँद तुम जागते रहना  
मेरे सपनों को आज  
ज़मीं पर है उतरना!  

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2017)

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Friday, June 30, 2017

549. धरा बनी अलाव (गर्मी के 10 हाइकु)

धरा बनी अलाव  
(गर्मी के 10 हाइकु)  

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1.  
दोषी है कौन?  
धरा बनी अलाव,  
हमारा कर्म!  

2.  
आग उगल  
रवि गर्व से बोला -  
सब झुलसो!  

3.  
रोते थे वृक्ष -  
'मत काटो हमको',  
अब भुगतो!  

4.  
ये पेड़ हरे  
साँसों के रखवाले  
मत काटो रे!  

5.  
बदली सोचे -  
आँखों में आँसू नहीं  
बरसूँ कैसे?  

6.  
बिन आँसू के  
आसमान है रोया,  
मेघ खो गए!  

7.  
आग फेंकता  
उजाले का देवता  
रथ पे चला!  

8.  
अब तो चेतो  
प्रकृति को बचा लो,  
नहीं तो मिटो!  

9.  
कंठ सूखता  
नदी-पोखर सूखे  
क्या करे जीव?  

10.  
पेड़ व पक्षी  
प्यास से तड़पते  
लिपट रोते!  

- जेन्नी शबनम (29. 6. 2017)

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Sunday, June 25, 2017

548. फ़ौजी-किसान (19 हाइकु)

फ़ौजी-किसान  
(19 हाइकु)  

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1.  
कर्म पे डटा  
कभी नहीं थकता  
फ़ौजी-किसान!  

2.  
किसान हारे  
ख़ुदकुशी करते,  
बेबस सारे!  

3.  
सत्ता बेशर्म  
राजनीति करती,  
मरे किसान!  

4.  
बिकता मोल  
पसीना अनमोल,  
भूखा किसान!  

5.  
कोई न सुने  
किससे कहे हाल  
डरे किसान!  

6.  
भूखा-लाचार  
उपजाता अनाज  
न्यारा किसान!  

7.  
माटी का पूत  
माटी को सोना बना  
माटी में मिला!  

8.  
क़र्ज़ में डूबा  
पेट भरे सबका,  
भूखा अकड़ा!  

9.  
कर्म ही धर्म  
किसान कर्मयोगी,  
जीए या मरे!  

10.  
अन्न उगाता  
सर्वहारा किसान  
बेपरवाह!  

11.  
निगल गई  
राजनीति राक्षसी  
किसान मृत!  

12.  
अन्न का दाता  
किसान विष खाता  
हो के लाचार!  

13.  
देव अन्न का  
मोहताज अन्न का  
कैसा है न्याय?  

14.  
बग़ैर स्वार्थ  
करते परमार्थ  
किसान योगी!  

15.  
उम्मीद टूटी  
किसानों की ज़िन्दगी  
जग से रूठी!  

16.  
हठी किसान  
हार न माने, भले  
साँसें निढाल!  

17.  
रंगे धरती  
किसान रंगरेज,  
ख़ुद बेरंग!  

18.  
माटी में सना  
माटी का रखवाला  
माटी में मिला!  

19.  
हाल बेहाल  
प्रकृति बलवान  
रोता किसान!  

- जेन्नी शबनम (20. 6. 2017)

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Thursday, June 1, 2017

547. मर गई गुड़िया...

मर गई गुड़िया...  

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गुड़ियों के साथ खेलती थी गुड़िया  
ता-ता थइया नाचती थी गुड़िया  
ता ले ग म, ता ले ग म गाती थी गुड़िया  
क ख ग घ पढ़ती थी गुड़िया  
तितली-सी उड़ती थी गुड़िया !  

ना-ना ये नही है मेरी गुड़िया  
इसके तो पंख है नुचे  
कोमल चेहरे पर ज़ख़्म भरे  
सारे बदन से रक्त यूँ है रिसता  
ज्यों छेनी हथौड़ी से कोई पत्थर है कटा!  

गुड़िया के हाथों में अब भी है गुड़िया  
जाने कितनी चीख़ी होगी गुड़िया  
हर प्रहार पर माँ-माँ पुकारी होगी गुड़िया  
तड़प-तड़प कर मर गई गुड़िया  
कहाँ जानती होगी स्त्री का मतलब गुड़िया!  

जिन दानवों ने गुड़िया को नोच खाया  
पौरुष दंभ से सरेआम हुंकार रहा  
दूसरी गुड़िया को तलाश रहा  
अख़बार के एक कोने में ख़बर छपी  
एक और गुड़िया हवस के नाम चढी!  

मूक लाचार बनी न्याय व्यवस्था  
सबूत गवाह सब अकेली थी गुड़िया  
जाने किस ईश का शाप मिला  
कैसे किसी ईश का मन न पसीजा  
छलनी हुआ माँ बाप का सीना!  

जाने कहाँ उड़ गई है मेरी गुड़िया  
वापस अब नही आएगी गुड़िया  
ना-ना अब नही चाहिए कोई गुड़िया  
जग हँसाई को हम कैसे सहे गुड़िया  
हम भी तुम्हारे पास आ रहे मेरी गुड़िया!

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2017)  

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Saturday, May 13, 2017

546. तहज़ीब...

तहज़ीब...

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तहज़ीब सीखते-सीखते  
तमीज़ से हँसने का शऊर आ गया  
तमीज़ से रोने का हुनर आ गया  
नहीं आया तो  
तहज़ीब और तमीज़ से  
ज़िन्दगी जीना न आया।  

- जेन्नी शबनम (13. 5. 2017)

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Thursday, May 11, 2017

545. हमारी माटी (गाँव पर 20 हाइकु)

हमारी माटी  
(गाँव पर 20 हाइकु)  

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1.  
किरणें आई  
खेतों को यूँ जगाए  
जैसे हो माई।  

2.  
सूरज जागा  
पेड़ पौधे मुस्काए  
खिलखिलाए।  

3.  
झुलसा खेत  
उड़ गई चिरैया  
दाना न पानी।  

4.  
दुआ माँगता  
थका हारा किसान  
नभ ताकता।  

5.  
जादुई रूप  
चहूँ ओर बिखरा  
आँखों में भरो।  

6.  
आसमाँ रोया  
खेतिहर किसान  
संग में रोए।  

7.  
पेड़ हँसते  
बतियाते रहते,  
बूझो तो भाषा?  

8.  
बहती हवा  
करे अठखेलियाँ  
नाचें पत्तियाँ।  

9.  
पास बुलाती  
प्रकृति है रिझाती  
प्रवासी मन।  

10.  
पाँव रोकती,  
बिछुड़ी थी कबसे  
हमारी माटी।  

11.  
चाँद उतरा  
चाँदनी में नहाई  
सभी मड़ई।  

12.  
बुढ़िया बैठी  
ओसारे पर धूप  
क़िस्सा सुनाती।  

13.  
हरी सब्ज़ियाँ  
मचान पे लटकी  
झूला झूलती।  

14.  
आम्र मंज़री  
पेड़ों पर खिलके  
मन लुभाए।  

15.  
गिरा टिकोला  
खट्टा-मीठा-ठिगना  
मन टिके ना।  

16.  
रवि हारता  
गरमी हर लेती  
ठंडी बयार।  

17.  
गप्पें मारती  
पूरबा व पछेया  
गाछी पे बैठी।  

18.  
बुढ़िया दादी  
टाट में से झाँकती  
धूप बुलाती।  

19.  
गाँव का चौक  
जगमग करता  
मानो शहर।  

20.  
धूल उड़ाती  
पशुओं की क़तार  
गोधूली वेला।  

- जेन्नी शबनम (11. 5. 2017)  

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Monday, April 24, 2017

544. सुख-दुःख जुटाया है...

सुख-दुःख जुटाया है...  

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तिनका-तिनका जोड़कर  
सुख-दुःख जुटाया है  
सुख कभी-कभी झाँककर  
अपने होने का एहसास कराता है  
दुःख सोचता है  
कभी तो मैं भूलूँ उसे  
ज़रा देर आराम करे  
मेरे मायके की  
टिन वाली पेटी में  
तिनका-तिनका जोड़कर  
सुख-दुख जुटाया है।  

- जेन्नी शबनम (24. 4. 2017)

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Monday, April 17, 2017

543. एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में...

एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में...

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तन्हा रहे ताउम्र अपनों की भीड़ में  
एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में!  

वक्त के आइने में दिखा ये तमाशा  
ख़ुद को निहारा पर दिखे न भीड़ में!  

एक अनदेखी ज़ंजीर से बँधा है मन  
तड़पे है पर लहू रिसता नहीं पीर में!  

शानों शौक़त की लम्बी फ़ेहरिस्त है  
साँस-साँस क़र्ज़दार गिनती मगर अमीर में!

रूबरू होने से कतराता है मन  
जंग देख न ले जग मुझमें औ ज़मीर में!  

पहचान भी मिटी सब अपने भी रूठे  
पर ज़िन्दगी रुकी रही कफ़स के नजीर में!  

बसर तो हुई मगर कैसी ये ज़िन्दगी  
हँसते रहे डूब के आँखों के नीर में!  

सफर की नादानियाँ कहती किसे 'शब'  
कमबख़्त उलझी ज़िन्दगी अपने शरीर में!  

- जेन्नी शबनम (17. 4. 2017)  

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Saturday, April 1, 2017

542. विकल्प...

विकल्प...  

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मेरे पास कोई विकल्प नहीं  
पर मैं हर किसी का विकल्प हूँ,  
कामवाली छुट्टी पर तो मैं  
रसोइया छुट्टी पर तो मैं  
सफाइवाली छुट्टी पर तो मैं  
धोबी छुट्टी पर तो मैं  
पशु को खिलानेवाला छुट्टी पर तो मैं  
चौकीदार छुट्टी पर तो मैं,  
इन सारे विकल्पों को निभाते हुए  
मैं विकल्पहीन हूँ,  
काश! मेरा भी कोई विकल्प हो  
एक दिन ही सही  
मैं छुट्टी पर जाऊँ!  

- जेन्नी शबनम (1. 4. 2017)  

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Friday, March 24, 2017

541. साथ-साथ...

साथ-साथ...  

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तुम्हारा साथ  
जैसे बंजर ज़मीन में  
फूल खिलना  
जैसे रेगिस्तान में  
जल का स्रोत फूटना!  
अक्सर सोचती हूँ  
तुममें कितनी ज़िन्दगी बसती है  
बार-बार मुझे वापस खींच लाते हो  
ज़िन्दगी में  
मेरे घर मेरे बच्चे  
सब से विमुख होती जा रही थी  
ख़ुद का जीना भूल रही थी!  
उम्र के इस ढलान पर  
जब सब साथ छोड़ जाते है  
न तुमने हाथ छुड़ाया  
न तुम ज़िन्दगी से गए  
तुमने ही दूरी पार की  
जब लगा कि  
इस दूरी से मैं खंडहर बन जाऊँगी!  
तुमने मेरे जज़्बातों को  
ज़मीन दी  
और उड़ने का हौसला दिया  
देखो मैं उड़ रही हूँ  
जी रही हूँ!  
तुम पास रहो  
या दूर रहो  
साथ-साथ रहना  
मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना  
मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना!  

- जेन्नी शबनम (24. 3. 2017)  

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Tuesday, March 21, 2017

540. नीयत और नियति...

नीयत और नियति...  

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नीयत और नियति
समझ से परे है
एक झटके में
सब बदल देता है,  
ज़िन्दगी अवाक्!  
काँधे पर हाथ धरे  
चलते-चलते  
पीठ में गहरी चुभन  
अनदेखे लहू का फ़व्वारा  
काँधे पर का हाथ
काँपता तक नहीं,  
ज़िन्दगी हत्प्रभ!  
सपनों के पीछे दौड़ते-दौड़ते  
जाने कितनी सदियाँ गुज़र जाती  
पर सपने न मुठ्ठी में न नींद में,  
ज़िन्दगी रूखसत!  
सुख के अम्बार को  
देखते-देखते  
चकाचौंध से झिलमिल
दुख का ग़लीचा  
पाँवों के नीचे बिछ जाता,  
ज़िन्दगी व्याकुल!  
पहचाने डगर पर  
ठिठकते-ठिठकते  
क़दम तो बढ़ते  
पर पक्की सड़क  
गड्ढे में तब्दील हो जाती,  
ज़िन्दगी बेबस!  
पराए घर को  
सँवारते-सँवारते  
उम्र की डोर छूट जाती  
रिश्ते बेमानी हो जाते  
हर कोने में मौजूद रहकर  
हर एक इंच दूसरों का  
पराया घर पराया ही रह जाता,  
ज़िन्दगी विफल!  
बड़ी लम्बी कहानी  
सुनते-सुनते  
हर कोई भाग खड़ा होता  
अपना-पराया कोई नहीं  
मन की बात मन तक  
साँसों की गिनती थमती नहीं,  
ज़िन्दगी बेदम!  
नियति और नीयत के चक्र में  
लहूलूहान मन,  
ज़िन्दगी कबतक?  

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2017)  

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Saturday, March 18, 2017

539. रेगिस्तान...

रेगिस्तान...

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मुमकिन है यह उम्र  
रेगिस्तान में ही चुक जाए  
कोई न मिले उस जैसा  
जो मेरी हथेलियों पर  
चमकते सितारों वाला  
आसमान उतार दे!  

यह भी मुमकिन है  
एक और रेगिस्तान  
सदियों-सदियों से  
बाँह पसारे मेरे लिए बैठा हो  
जिसकी हठीली ज़मीन पर  
मैं खुशबू के ढाई बोल उगा दूँ!  

कुछ भी हो सकता है  
अनदेखा अनचाहा  
अनकहा अनसुना  
या यह भी कि तमाम ज़माने के सामने  
धड़धड़ाता हुआ कँटीला मौसम आए  
और मेरे पेशानी से लिपट जाए! 

यह भी तो मुमकिन है  
मैं रेगिस्तान से याराना कर लूँ  
शबो सहर उसके नाम गुनगुनाऊँ  
साथ जीने मरने की कस्में खाऊँ  
और एक दूसरे के माथे पर  
अपने लहू से ज़िन्दगी लिख दूँ!  

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2017)

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Monday, March 13, 2017

538. जागा फागुन (होली के 10 हाइकु)

जागा फागुन 

(होली के 10 हाइकु)

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1.  
होली कहती  
खेलो रंग गुलाल  
भूलो मलाल!  

2.  
जागा फागुन  
एक साल के बाद,  
खिलखिलाता!  

3.  
सब हैं रँगे  
फूल तितली भौंरे  
होली के रंग!  

4.  
खेल तो ली है  
रंग-बिरंगी होली  
रँगा न मन!  

5.  
छुपती नहीं  
होली के रंग से  
मन की पीर!  

6.  
रंग अबीर  
तन को रँगे, पर  
मन फ़क़ीर!  

7.  
रंगीली होली  
इठलाती आई है  
मस्ती छाई है!  

8.  
उड़ के आता  
तन मन रँगता  
रंग गुलाल!  

9.  
मुर्झाए रिश्ते  
किसकी राह ताके  
होली बेरंग!  

10.  
रंग अबीर  
फगुनाहट लाया  
मन बौराया!  

- जेन्नी शबनम (12. 3. 2017)

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Wednesday, March 1, 2017

537. हवा बसन्ती (बसन्त ऋतु पर 10 हाइकु)

हवा बसन्ती  
(बसन्त ऋतु पर 10 हाइकु)

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1.  
हवा बसन्ती  
लेकर चली आई  
रंग बहार!  

2.  
पीली ओढ़नी  
लगती है सोहणी  
धरा ने ओढ़ी!  

3.  
पीली सरसों  
मस्ती में झूम रही,  
आया बसन्त!  

4.  
कर शृंगार  
बसन्त ऋतु आई  
बहार छाई!  

5.  
कोयल कूकी -  
आओ सखी बसन्त!  
साथ में नाचें!  

6.  
धूप सुहानी  
छटा है बिखेरती  
झूला झूलती!  

7.  
पात झरते,  
जीवन होता यही,  
सन्देश देते!  

8.  
विदा हो गया  
ठिठुरता मौसम,  
रुत सुहानी!  

9.  
रंग फैलाती  
कूदती-फाँदती ये,  
बसन्ती हवा!  

10.  
मधुर तान  
चहूँ ओर छेड़ती  
हवा बसन्ती!  

- जेन्नी शबनम (1. 3. 2017)

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