Thursday, February 26, 2015

486. धृष्टता...

धृष्टता... 

******* 

जितनी बार मिली तुमसे
ख्वाहिशों ने जन्म लिया मुझमें  
जिन्हें यकीनन पूरा नहीं होना था  
मगर दिल कब मानता है...   
यह समझती थी
तुम अपने दायरे से बाहर न आओगे
फिर भी एक नज़र देखने की आरज़ू
और चुपके से तुम्हें देख लेती
नज़रें मिलाने से डरती
जाने क्यों खींचती हैं तुम्हारी नज़रें
अब भी याद है
मेरी कविता पढ़ते हुए
उसमें ख़ुद को खोजने लगे थे तुम  
अपनी चोरी पकड़े जाने के डर से
तपाक से कह उठी मैं
''पात्र को न खोजना''
फिर भी तुमने ख़ुद को
खोज ही लिया उसमें
मेरी इस धृष्टता पर
मुस्कुरा उठे तुम
और चुपके से बोले
''प्रेम को बचा कर नहीं रखो !''   
मैं कहना चाहती थी -
बचाना ही कब चाहती हूँ
तुम मिले जो न थे
तो खर्च कैसे करती  
पर... कह पाना कठिन था  
शायद जीने से भी ज्यादा
अब भी जानती हूँ 
महज़ शब्दों से गढ़े पात्र में
तुम ख़ुद को देखते हो 
और बस इतना ही चाहते भी हो
उन शब्दों में जीती मैं को 
तुमने कभी नहीं देखा 
या देखना ही नहीं चाहा 
बस कहने को कह दिया था
फिर भी एक सुकून है
मेरी कविता का पात्र
एक बार अपने दायरे से बाहर आ
कुछ लम्हे दे गया था मुझे !  

- जेन्नी शबनम (26. 2. 2015)

___________________________________


Saturday, February 14, 2015

485. लम्हों का सफ़र...

लम्हों का सफ़र...  

*******

आसमान की विशालता  
जब अधीरता से खींचती है  
धरती की गूढ़ शिथिलता  
जब कठोरता से रोकती है  
सागर का हठीला मन
जब पर्वत से टकराता है  
तब एक आँधी
मानो अट्टहास करते हुए गुज़रती है  
कलेजे में नश्तर चुभता है   
नस-नस में लहू उत्पात मचाता है  
वक़्त का हर लम्हा   
काँपता थरथराता   
खुद को अपने बदन में नज़रबंद कर लेता है !  

मन हैरान है  
मन परेशान है   
जीवन का अनवरत सफ़र
लम्हों का सफ़र
जाने कहाँ रुके
कब रुके  
जीवन के झंझावत
अब मेरा बलिदान माँगते हैं
मन न आह कहता है
न वाह कहता
कहीं कुछ है  
जो मन में घुटता है
पल-पल मन में टूटता है
मन को क्रूरता से चीरता है !  

ठहरने की बेताबी
कहने की बेक़रारी
अपनाए न जाने की लाचारी
एक-एक कर
रास्ता बदलते हैं
हाथ की लकीर और माथे की लकीर
अपनी नाकामी पर
गलबहिया डाले  
सिसकते हैं !  

आकाश और धरती
अब भावविहीन हैं
सागर और पर्वत चेतनाशून्य हैं
हम सब हारे हुए मुसाफ़िर
न एक दूसरे को ढाढ़स देते हैं
न किसी की राह के काँटे बीनते हैं
सब के पाँव के छाले
आपस में मूक संवाद करते हैं !  

अपने-अपने  
लम्हों के सफ़र पर निकले हम
वक्त को हाज़िर नाज़िर मानकर
अपने हर लम्हे को यहाँ दफ़न करते हैं   
चलो अब अपना सफ़र शुरू करते हैं !

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2015)

____________________________________

Tuesday, February 10, 2015

484. मन ! तुम आज़ाद हो जाओगे

मन ! तुम आज़ाद हो जाओगे  

*******

अक्स मेरा मन       
मुझसे उलझता है    
कहता है कि वो सारे सच    
जिसे मन की तलहटी में  
जाने कब से छुपाया है मैंने    
जगज़ाहिर कर दूँ
चैन से सो नहीं पाता है वो  
सारी चीख़ें
हर रात उसे रुलाती हैं
सारी पीड़ा भरभराकर  
हर रात उसके सीने पर गिर जाती हैं  
सारे रहस्य हर रात कुलबुलाते हैं
और बाहर आने को धक्का मारतें हैं  
इन जद्दोजहद में गुज़रती हर रात  
यूँ लगता है  
मानो अाज आख़िरी है
लेकिन सहर की धुन जब बजती है  
मेरा मन ख़ुद को ढाढ़स देता है
बस ज़रा-सा सब्र और कर लो
मुमकिन है
एक रोज़ जीवन से शब बिदा हो जाएगी  
उस आखिरी सहर में  
मन ! तुम आज़ाद हो जाओगे ।  

- जेन्नी शबनम (10. 2. 2015)

_______________________________

Thursday, February 5, 2015

483. आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम

आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम 

******* 

इल्म न था इस क़दर टूटेंगे हम   
ये आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम !  

सपनों की बातें सारी झूठी-मुठी
लेकिन कच्चे-पक्के सब बोएँगे हम !  

मालूम तो थी तेरी मगरूरियत
पर तुझको चाहा कैसे भूलेंगे हम !  

तेरे लब की हँसी पे हम मिट गए
तुझसे कभी पर कह न पाएँगे हम !  

तुम शेर कहो हम ग़ज़ल कहें
ऐसी हसरत ख़ुद मिटाएँगे हम !  

तू जानता है पर ज़ख़्म भी देता है
तुझसे मिले दर्द से टूट जाएँगे हम !  

किसने कब-कब तोड़ा है 'शब' को
यह कहानी नही सुनाएँगे हम ! 

- जेन्नी शबनम (5. 2. 2015) 

________________________________